नफरतों से भरा चिंटू
दिलेरी का मुक़ाबला तो है नहीं कि लठ्ठ या तलवार से बराबरी तय हो जाए। ख़ून के बदले ख़ून का दौर अब रहा नहीं। फिर अब जो तंत्र है उसमें न चपरासी आपके, न सिपाही आपके, न जज, न अफसर और न सरकारें आपकी। मुक़ाबला भी नीचता, धूर्तता और छल कपट से है। कैसे निपटेंगे? नौ गज़ की ज़बान, घुटनों में दिमाग़ और चौराहे पर अक़्ल बेचकर? जिनके घर में निवालों के ठिकाने नहीं वो ट्रंप की टांग तोड़ने पर उतारू हैं। हर इंसान की अपनी तजवीज़ हैं। मान ली आपकी बात कि मुद्दा सिर्फ गाय नहीं है। या डर बैठाना है। ये चुनावी सियासत है। आपकी इनमें से किसी बात से इंकार नहीं हैं। ऐसे मूर्ख हम भी भी नहीं जो समझते नहीं। लेकिन पिछले 20-25 साल में आपने जो मूर्खताएं और शतुरमुर्ग़ी फितरत दिखाई हैं उन्हें लेकर कहां जाएं? इस बात को सियासी दल और नफरती चिंटू भी जान गए हैं। दंगों के दौर में आप हमेशा अपने पाले के बाहर पकड़े गए। मज़लूम होकर भी मुलज़िम रहे।
यही कथित आतंकवाद वाले दौर में हुआ और यही मौजूदा लिंचिंग के ज़माने में भी। बेवजह ऑफ द गार्ड धरे जाने की कोशिश में हो। आपकी हरकतें ऐसी हैं कि दुनिया भर में कुट रहे हो मगर फिर भी ज़ालिम कहला रहे हो। आप कद्दू का छिलका नहीं छील सकते मगर हर सार्वजनिक जगह पर दावा करोगे मंगल ग्रह को गुलेल से गिराने के। अरे भैया सियासत, कूटनीति, मसलेहत, डील, मास्टरस्ट्रोक, डिप्लोमेसी कोई शब्द हैं डिक्शनरी में तो कोई तो वजह होगी। दलाली, कथित दिलेरी और दूसरे को कटवा कर ख़ुद भाग जाना ही सियासत नहीं है। कर्फ्यू भी देख लिए, बेगुनाह जवानों को जेल जाते और एन्काउन्टर में मरते भी देख लिया। अब भी देख रहे हैं। आपकी दिलेरी और कथित हिसाब किताब के सारे जमा-जोड़ और हासिल यहीं हैं। ज़बान का क़द और दावों का दायरा भी हर साल वसी हो रहा है। बहरहाल, सही वक़्त पर सही क़दम और सही मौक़े पर सही बात की क़ीमत होती है। इतना न समझ रहे तो भैया इस फर्ज़ी ज्ञान पर दो शेर बतौर कफन डाल कर अपनी बात ख़त्म करता हूं। डाक्टर वसीम बरेलवी कहते हैं कि, कौन सी बात, कब कहां कैसे, कही जाती है। ये शऊर हो तो हर बात सुनी जाती है। इधर हम जैसे किसी ज़िल्लत के मारे किसी दिलजले शायर का कहना है
कि सौ जूतों से कम रुतबा ए आली नहीं होती। इज़्ज़त वो ख़ज़ाना है जो ख़ाली नहीं होती। अल्लाह अल्लाह ख़ैर सल्ला।