एक समय होता है जब आपके पास विकल्प नहीं होते
आपको अंधी मेहनत करनी पड़ती है।
न खाने का होश, न सोने का टाइम।
बस मेहनत, मेहनत और मेहनत।
फिर उम्र का एक ऐसा पड़ाव आता है
जब बढ़ती उम्र के साथ आपका शरीर थोड़ा जवाब देने लगता है।
तब तक आप थोड़े सक्षम हो चुके होते हैं —
ज़्यादा नहीं तो इतना ज़रूर कि
जिस मेहनत से आपने अपनी ज़िंदगी खड़ी की,
अब वही शरीर उसका मुआवज़ा माँगता है।
वह मुआवज़ा यह है कि —
“थोड़ा रुक जाओ अब।
पहले जैसा नहीं रहा,
अब मुझे भी अपना ख्याल रखना है।
अन्यथा मैं गड़बड़ हो गया,
तो फिर क्या ही कर लोगे?”
लेकिन इंसान अनसुना करता जाता है —
कभी मजबूरी में, कभी जबरिया अनसुना करवाया जाता है ।
जबकि अब वह इतना सक्षम हो चुका होता है
कि साल-दो साल भी बैठकर खा ले,
तो भी कोई दिक्कत नहीं।
शरीर में कुछ गड़बड़ियाँ आने लगी हैं,
जिनका इलाज कराकर वह फिर से काम पर लग सकता है।
पर वहीं आ जाता है दबाव —
खुद अपनों का ही।
जो लालच में आकर उसकी हालत को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
जो यह तक नहीं समझना चाहते कि
अगर यही न बचा, तो आगे क्या होगा।
और वह इंसान —
जिसे खुद अपनी सेहत का अंदाज़ा है कि
इस स्थिति में मैं ज़्यादा दिन नहीं चल पाऊँगा —
फिर भी बैल की तरह जुट जाता है।
और अफ़सोस...
नतीजा वही, जिसका अंदेशा था।
क्या ही फ़ायदा हुआ?
चली गई एक ज़िंदगी —
सिर्फ़ कमाने में।
जबकि उसे अभी जाना नहीं था।
क्या ही कहा जा सकता है,
और अब क्या ही किया जा सकता है।
लोग न जाने कब समझेंगे —
आदमी सिर्फ़ पैसा बनाने की मशीन नहीं होता।
😔