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आज़ 'सूरज भी, मेरे कहने से, निकलता है

 *आज़ 'सूरज भी, मेरे कहने से, निकलता है!*


*'दिये, भी छोड़ दिए 'जलना, अब क्या बाकी है ?*


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*कायरों को युद्ध बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि उन्हें खुद नहीं लड़ना पड़ता!*

रूस को लगा था कि वह बहुत शक्तिशाली देश है !

अपने सीमाओं की सुरक्षा के नाम पर विश्व पटल पर उभरते हुए खुद से बहुत कमजोर दर कमज़ोर यूक्रेन को ....

अपने अपार सैन्य शक्ति के दम पर चार दिन के अंदर मुट्ठी में दबोच कर...

उसे अपनी सीमा में मिला लेगा, 

इसी के साथ विश्व मानव समुदाय को चमत्कृत कर देगा।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ।

बहुत घमासान युद्ध हुआ। 

*यूक्रेन के राष्ट्रपति के तरफ से बार-बार युद्ध विराम की अपील की गई।*

लेकिन पुतिन की तरफ से संधि प्रस्ताव पर इतनी उत्तेजक शर्तें थी कि,

 जो नाटो देश सहित अमेरिका और यूक्रेन को नागवार थी।

महा भयंकर संग्राम हुआ!

 तमाम युद्ध प्रेमियों ने सामरिक कला कौशल का इस घटना से,

 अच्छा खासा ज्ञान अर्जित किया। 

*मानवाधिकार की अनदेखी हुई... स्कूल, अस्पताल, एंबुलेंस, रहिवासी बस्तियां, स्त्री और बच्चे तक रूस की 'महत्वाकांक्षा' के निशाने पर रहे।*

वार को थामते थामते और झेलते हुए यूक्रेन के अंदर ,

इतनी तबाही किंतु जोश का आलम भर गया कि ....

*उसके संसाधन हीन सैनिकों ने इस जिंदगी से मौत अच्छी, का मंत्र मानकर रसिया पर जैसे तैसे जवाबी कार्रवाई की शुरूआत किया।*

रूस के तेल के एक गोदाम पर यूक्रेनी  बमबारी के पहले ही मुक्के की तिलमिलाहट से ,

रूस को अपने 'बड़प्पन पर चोट' लगती हुई महसूस हुई ।

उसके बदले रूस ने युद्ध की गर्मी को और आंच दे दिया। 

*तोपों की गर्जना, रॉकेट की स्पीड... घायल सैनिक, उखड़ी हुई सड़के जलते हुए टैंक, मरते सड़ते टूटते बिखरते नागरिक लूटी हुई स्त्रियां बिन मां के बच्चों की चीख पुकार और रुदन के बीच,*

शरणार्थी  शिविरों में भूखे प्यासे विचलित, किंतु देश के प्रति वफादारी लिए यूक्रेनी नागरिक...

और ड्रामा करती मीडिया की नाच कूद करती हुई ब्रेकिंग न्यूज़ की टीआरपी बढ़ाती पक्षपाती घोषणाएं... 

*यूक्रेन का सत्ताधारी राजनीतिक वोलोडिमिर जेलेंसकी का आत्म प्रेरित उत्साह,*

 यूक्रेन वासियो के प्रति प्यार....

बिखरते जलते यूक्रेन और तड़पते घायल  सैनिकों और ,

आम जनता में उत्साह भर दिया है।

*चार दिन में युद्ध फतह कर लेने की पुतिन की कामना उनके अहंकार की दलदल में सिमट कर रह गई !*

बड़े-बड़े रिटायर्ड रक्षा विशेषज्ञ....

 रूस ही कामयाब होगा,  

दो दिन और लगेगा, रूस यूक्रेन पर कब्जा कर लेगा, 

 की फर्जी घोषणा करते रह गए।

*वह युद्ध दिन, महीने, सप्ताह नहीं, कई वर्ष तक चला।*

नाटो का झूठ और अमेरिकी चरित्र दुनिया की नजरों के सामने निकल कर आ चुका था। 

इसलिए लेख आशय केवल इतना है कि...

*किसी भी लोकतांत्रिक देश में वहां के मायावी  'कलाकार शासक द्वारा,*

अपनी अवाम को दिखावे के तौर पर खुश करने और उस खुशी के बदले ....

*सत्ता हासिल करने की सोच ने मानवता को बहुत नुकसान पहुंचाया...*

पुतिन को न्याय, अन्याय, इंसानियत या और कुछ नहीं सोचने दिया।

जबकि दोनों देशों में युद्ध के चलते तरक्की के उड़ते पंख टूट कर बिखरने लगे। 

अगल-बगल के पड़ोसी देश ने यूक्रेन को पिछले दरवाजे से इतनी मदद की कि,

 रूस को यह समझ में ही नहीं आ रहा था कि ....

*आखिर अदना सा 'रोटी का मोहताज' यूक्रेन अचानक कितना मजबूत हो गया है ?*

वह तो 'पाकिस्तान' से भी छोटा और हल्के कद का राष्ट्र है।

सच तो यह है कि जब दो मुल्कों के बीच किसी बात को लेकर युद्ध छिड़ता है तो ....

*तमाम 'अवसरवादी राष्ट्र' उस विपत्ति की घड़ी में अपने भी 'तोपों के बैरल' की लगी जंग साफ़ कर लेते हैं।*

ऐसा इल्ज़ाम पुतिन ने नाटो सहित अमेरिका पर भी लगाया था कि,

 यूक्रेन की मदद करना बंद करो। 

लेकिन वे लोग साफ मुकर गए। लेकिन 'खूनी ड्रैगन" चीन ने....

उस युद्ध में अपनी हुंकार भरने से परहेज़ नहीं किया।

*चीन के संबंध भारत से बहुत अच्छे हैं...? लेकिन उसके दिल में पाकिस्तान के लिए कोई नफ़रत नहीं है!*

टेलीविजन के परदे पर महाभारत और रामायण का युद्ध का आनंद लेना,

 राम और रावण की वाण वर्षा में कौन जीतेगा और कौन हारेगा ?

का दृश्य बड़ा मनोहारी लगता है। 

लेकिन जब ख़ुद की ज़िंदगी कहीं युद्ध में आ फंसती है तो....

 व्यक्ति सोचता है कि ऑफिस के रास्ते पैदल चलकर अपने घर पहुंच पाउंगा कि नहीं?

 मेरे बच्चे स्कूल से लौट पाए होंगे कि नहीं ?

मेरी बेटी  बीबी घर को कहीं किसी दुश्मन के बम ने ना उड़ा दिया हो ।

हर धमाका खुद पर गिरता हुआ महसूस होता है।

बम वर्षा करने वाली विमानों की मारक टोलियां ,

*आसमान से धरती की ओर लक्ष्य बनाकर जब 'कई टन बारूद' किसी देश के किसी भूभाग पर उड़ेल देते हैं।*

अथवा युद्ध में दोनों मुल्कों के कुछ विमान ....

आसमान में ही मार दिए जाते हैं।

लेकिन उनके जलते गिरते हुए मलबे,

 बिखरते हुए बारूद और जानलेवा गोले ....

युद्ध के पहले की, की गई कल्पना.....

*बड़े-बड़े महंगे और घातक विदेशी सामरिक हथियार, लंबी चौड़ी फौज़, जज्बाती भाषण और बेजोड़ युद्ध अभ्यास, फुल लाइट / 'ब्लैक आउट' के अर्थ को कमज़ोर कर देते हैं।*

बुद्ध में विश्वास रखने वाले लोग.....

युद्ध की कल्पना से भी परहेज करते हैं।

बाल बच्चे वालों को तो केवल यही प्रार्थना करनी चाहिए कि, हे ऊपर वाले...

*विश्व का कल्याण हो!*

 *प्राणियों में सद्भाव हो,*


  डा. मेला

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