ये हैं जॉर्ज इब्राहीम अब्दल्लाह।
इन्हें 1984 में फ्रांस की हुकूमत ने गिरफ़्तार किया था।
इल्ज़ाम था कि इन्होंने दो सिफ़ारतकारों एक अमरीकी और एक इस्राईली की हत्या में हिस्सा लिया।
1987 में इन्हें उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी।
जॉर्ज इब्राहिम का कहना था ये इलज़ाम झूठा है, मेरा असल जुर्म ये था कि मैने फ़लस्तीन के मज़लूमों का साथ दिया।
उन्होंने ज़ायोनिज़्म, साम्राज्यवाद, और सियासी ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई।
उन्होंने मज़लूम की तरफ़ खड़े होने को अपना फ़र्ज़ समझा और इसकी क़ीमत उन्होंने 40 साल की क़ैद से अदा की।
40 साल तक जेल में रहे,मगर न कभी माफ़ी मांगी, न कभी सोच बदली, न अपने मक़सद से पीछे हटे।
वो कहते हैं मैं आज़ाद था, हूँ और रहूंगा चाहे सलाख़ें हों या ज़ंजीरें।
उनका ये जुमला जेल की दीवारों से टकराकर पूरी दुनिया में गूंजा।
3 दिन पहले इसी जुलाई 2025, पेरिस की अदालत ने उनकी रिहाई को मंज़ूरी दी
मगर एक शर्त के साथ की उन्हें फ़्रांस से हमेशा के लिए निर्वासित किया जाएगा।
जॉर्ज अब्दल्लाह को लेबनान भेज दिया गया,
जहाँ उनकी वापसी को एक हीरो की वापसी माना जा रहा है।
बेरूत एयरपोर्ट पर हज़ारों लोग उनका इस्तक़बाल करने पहुंचे। हाथों में फ़लस्तीन के झंडे, आँखों में आँसू, दिल में इज़्ज़त, लोगों ने उन्हें गले लगाया जैसे कोई अपना शहीद लौट आया हो।
हक़ की राह तवील हो सकती है, मगर आख़िर में रोशनी जीतती है।


