सीरिया पर बेवजाह शुरू हुए इसराइली हमलों का DNA
कल तक आपस में गलबहियाँ करने वाले नेतन्याहू और जुलानी भाऊ अचानक दुश्मन क्यो हो गए अगर इसका पोस्टमार्टम किया जाए तो आप को पता चले गा एक कांड! वो कांड ये है की फिलिस्तीन की लड़ाई से ऊब चुका इसराइल जो इस जंग से बाहर आना चाहता है उसको और पूरे अरब देशों को एक बात खाए जा रही थी की युद्ध ख़त्म हुआ तो इसका सारा श्रे ईरान को चला जाएगा और ईरान जो मध्य एशियाई देशों का सबसे बलवान देश बन के उभरा है कल वो अरब देशों के लिए भी ख़तरा ना बन जाए क्यो की सभी अरब देशों की आम जानता के दिलो पर इस समय ईरान राज कर रहा है सत्ता भले ही अरब देशों के राजसी परिवारों के हाथों में हो मगर जानता इमाम खामेनाई को अपना लीडर मान चुकी है।
इसराइल इस जीत का श्रे ईरान को नहीं जाने देना चाहता इस लिए यहूद और नसारा की मिली जुली खोपड़ी एक यूनिक आइडिया लेके आई है।
१.इसराइल और सीरिया युद्ध केवल १० दिन के भीतर ही ख़त्म होगा और युद्ध विराम की शर्ते अब ईरान की तरफ़ से नहीं होंगी सीरिया की तरफ़ से होंगी
२. सिर में भेड़े का दिमाग़ भरे हमारे सुन्नी भाई जुलानी को ख़लीफ़ा स्वीकार करे गे जीत का जश्न मनाए गे
३. जुलानी फिलिस्तीन में हमास को किनारा लगा के जंगी लश्कर खड़ा करे गा और इसराइल अमेरिका के इशारे पर काम करे गा।
४. जितना भी ज़ुल्म अभी इसराइल ख़ुद कर रहा था अब वो जुलानी के हाथो होगा जैसे लेबनान के हिज़्बुल्लाह को ख़त्म करना
५. फिलिस्तीन में ग़ज़ा और वेस्ट बैंक के पुनर निर्माण का ठेका सऊदी अरब के ज़रिए जुलानी को ही मिले गा और नया ख़लीफ़ा आँखों के सामने फिर से मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बनाएगा ।
आप को बताते चले की १४०० साल से अब तक दिमाग़ का सबसे कम प्रयोग करने वाली इकलौती क़ौम हमारे नफ़्स ओ जान हमारे सुन्नी भाई ही है। इस्लाम के शुरुआती दौर में जब खैबर का युद्ध यहूदी हार गए तो उन्होंने ३०० साल तक तो कोई युद्ध प्रतियक्ष रूप से मुसलमानों से नहीं लड़ा बल्कि उन्होंने मुसलमानों के पूरे स्वभाव को पढ़ना और समझना शुरू कर दिया जिसके बाद उन्होंने ये समझा कि मुसलमान अधिकतर सत्ता लोभी होते है इनको आपस में लड़वा कर इनको अपना ग़ुलाम बनाया जा सकता है। आज आधे से ज़्यादा मुस्लिम देश सत्ता के लोभ में इस्लाम की मूल शिक्षाओ के विपरीत यहूद और नस्सरा के इशारों पर सत्ता चला रहे है उनकी ग़ुलामी स्वीकार किए हुए है।
बहरहाल ये जो की बिल्कुल ना मुमकिन बात है की सभी मुस्लिम देश ईरान को अपना नेतृत्व करने को इजाज़त दे और एक यूनाइटेड उम्मा संघ बनाए केवल पाँच साल में ही अगर इस्लामी देशों की काया कल्प ना हो जाय तो देखना।
लेकिन दिमाग़ के पैदल मुस्लिम शासक अमेरिका और इसराइल की ग़ुलामी तो स्वीकार कर सकते है ईरान की दोस्ती नहीं।